Friday, 17 January 2020

Bhaktambar Stotra (Sanskrit)

  भक्तामर-स्तोत्र (संस्कृत)

भक्तामर - प्रणत - मौलि - मणि -प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित - पाप - तमो - वितानम्।
सम्यक् -प्रणम्य जिन - पाद - युगं युगादा-
वालम्बनं भव - जले पततां जनानाम्।। 1॥

य: संस्तुत: सकल - वाङ् मय - तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि - पटुभि: सुर - लोक - नाथै:।
स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय - चित्त - हरैरुदारै:, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ 2॥

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित - पाद - पीठ! 
स्तोतुं समुद्यत - मतिर्विगत - त्रपोऽहम्।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- 
मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥ 3॥

वक्तुं गुणान्गुण -समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्, 
कस्ते क्षम: सुर - गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ।
कल्पान्त -काल - पवनोद्धत- नक्र- चक्रं , 
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥ 4॥

सोऽहं तथापि तव भक्ति - वशान्मुनीश! 
कर्तुं स्तवं विगत - शक्ति - रपि प्रवृत्त:।
प्रीत्यात्म - वीर्य - मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम् 
नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥ 5॥

अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम, 
त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।
यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति, 
तच्चाम्र -चारु -कलिका-निकरैक -हेतु:॥ 6॥

त्वत्संस्तवेन भव - सन्तति-सन्निबद्धं, 
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् ।
आक्रान्त - लोक - मलि -नील-मशेष-माशु, 
सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥ 7॥

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद, -
मारभ्यते तनु- धियापि तव प्रभावात् ।
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु, 
मुक्ता-फल - द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥ 8॥

आस्तां तव स्तवन- मस्त-समस्त-दोषं, 
त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ।
दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव, 
पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥ 9॥

नात्यद्-भुतं भुवन - भूषण ! भूूत-नाथ! 
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त - मभिष्टुवन्त:।
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा 
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ 10॥

दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष - विलोकनीयं, 
नान्यत्र - तोष- मुपयाति जनस्य चक्षु:।
पीत्वा पय: शशिकर - द्युति - दुग्ध-सिन्धो:, 
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥ 11॥

यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं, 
निर्मापितस्- त्रि-भुवनैक - ललाम-भूत !
तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां, 
यत्ते समान- मपरं न हि रूप-मस्ति॥ 12॥

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि, 
नि:शेष- निर्जित - जगत्त्रितयोपमानम् ।
बिम्बं कलङ्क - मलिनं क्व निशाकरस्य, 
यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥

सम्पूर्ण- मण्डल-शशाङ्क - कला-कलाप-
शुभ्रा गुणास् - त्रि-भुवनं तव लङ्घयन्ति।
ये संश्रितास् - त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं, 
कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥ 14॥

चित्रं - किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग-नाभिर्- 
नीतं मनागपि मनो न विकार - मार्गम्।
कल्पान्त - काल - मरुता चलिताचलेन, 
किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ 15॥

निर्धूम - वर्ति - रपवर्जित - तैल-पूर:, 
कृत्स्नं जगत्त्रय - मिदं प्रकटीकरोषि।
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां, 
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥ 16॥

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:, 
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्- जगन्ति।
नाम्भोधरोदर - निरुद्ध - महा- प्रभाव:, 
सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥ 17॥

नित्योदयं दलित - मोह - महान्धकारं, 
गम्यं न राहु - वदनस्य न वारिदानाम्।
विभ्राजते तव मुखाब्ज - मनल्पकान्ति, 
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥ 18॥

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा, 
युष्मन्मुखेन्दु- दलितेषु तम:सु नाथ!
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके, 
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥ 19॥

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं, 
नैवं तथा हरि -हरादिषु नायकेषु।
तेजः स्फ़ुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं, 
नैवं तु काच -शकले किरणाकुलेऽपि॥ 20॥

मन्ये वरं हरि- हरादय एव दृष्टा, 
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:, 
कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥ 21॥

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्, 
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं, 
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥ 22॥

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस- 
मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्।
त्वामेव सम्य - गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं, 
नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥ 23॥

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं, 
ब्रह्माणमीश्वर - मनन्त - मनङ्ग - केतुम्।
योगीश्वरं विदित - योग-मनेक-मेकं, 
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥ 24॥

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्, 
त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्करत्वात् ।
धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्, 
व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ 25॥

तुभ्यं नमस् - त्रिभुवनार्ति - हराय नाथ! 
तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल -भूषणाय।
तुभ्यं नमस् - त्रिजगत: परमेश्वराय, 
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ 26॥

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्- 
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !
दोषै - रुपात्त - विविधाश्रय-जात-गर्वै:, 
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ 27॥

उच्चै - रशोक- तरु - संश्रितमुन्मयूख - 
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्।
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं, 
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ 28॥

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे, 
विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्।
बिम्बं वियद्-विलस - दंशुलता-वितानं 
तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥ 29॥

कुन्दावदात - चल - चामर-चारु-शोभं, 
विभ्राजते तव वपु: कलधौत -कान्तम्।
उद्यच्छशाङ्क- शुचिनिर्झर - वारि -धार- 
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥ 30॥

छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क- कान्त- 
मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्।
मुक्ता - फल - प्रकर - जाल-विवृद्ध-शोभं, 
प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्॥ 31॥

गम्भीर - तार - रव-पूरित-दिग्विभागस्- 
त्रैलोक्य - लोक -शुभ - सङ्गम -भूति-दक्ष:।
सद्धर्म -राज - जय - घोषण - घोषक: सन्, 
खे दुन्दुभि-र्ध्वनति ते यशस: प्रवादी॥ 32॥

मन्दार - सुन्दर - नमेरु - सुपारिजात- 
सन्तानकादि - कुसुमोत्कर - वृष्टि-रुद्धा।
गन्धोद - बिन्दु- शुभ - मन्द - मरुत्प्रपाता, 
दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥ 33॥

शुम्भत्-प्रभा- वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते, 
लोक - त्रये - द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती।
प्रोद्यद्- दिवाकर-निरन्तर - भूरि -संख्या, 
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥

स्वर्गापवर्ग - गम - मार्ग - विमार्गणेष्ट:, 
सद्धर्म- तत्त्व - कथनैक - पटुस्-त्रिलोक्या:।
दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व- 
भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥ 35॥

उन्निद्र - हेम - नव - पङ्कज - पुञ्ज-कान्ती, 
पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:, 
पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥ 36॥

इत्थं यथा तव विभूति- रभूज् - जिनेन्द्र ! 
धर्मोपदेशन - विधौ न तथा परस्य।
यादृक् - प्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा, 
तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥

श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल, 
मत्त- भ्रमद्- भ्रमर - नाद - विवृद्ध-कोपम्।
ऐरावताभमिभ - मुद्धत - मापतन्तं 
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ 38॥

भिन्नेभ - कुम्भ- गल - दुज्ज्वल-शोणिताक्त, 
मुक्ता - फल- प्रकरभूषित - भूमि - भाग:।
बद्ध - क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि, 
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ 39॥

कल्पान्त - काल - पवनोद्धत - वह्नि -कल्पं, 
दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल - मुत्स्फुलिङ्गम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख - मापतन्तं, 
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥

रक्तेक्षणं समद - कोकिल - कण्ठ-नीलम्, 
क्रोधोद्धतं फणिन - मुत्फण - मापतन्तम्।
आक्रामति क्रम - युगेण निरस्त - शङ्कस्- 
त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥

वल्गत् - तुरङ्ग - गज - गर्जित - भीमनाद- 
माजौ बलं बलवता - मपि - भूपतीनाम्।
उद्यद् - दिवाकर - मयूख - शिखापविद्धं 
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥

कुन्ताग्र-भिन्न - गज - शोणित - वारिवाह, 
वेगावतार - तरणातुर - योध - भीमे।
युद्धे जयं विजित - दुर्जय - जेय - पक्षास्- 
त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥

अम्भोनिधौ क्षुभित - भीषण - नक्र - चक्र- 
पाठीन - पीठ-भय-दोल्वण - वाडवाग्नौ।
रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान - पात्रास्- 
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥

उद्भूत - भीषण - जलोदर - भार- भुग्ना:, 
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:।
त्वत्पाद-पङ्कज-रजो - मृत - दिग्ध - देहा, 
मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥ 45॥

आपाद - कण्ठमुरु - शृङ्खल - वेष्टिताङ्गा, 
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट - जङ्घा:।
त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:, 
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥

मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज - दवानलाहि- 
संग्राम-वारिधि-महोदर - बन्ध -नोत्थम्।
तस्याशु नाश - मुपयाति भयं भियेव, 
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥

स्तोत्र - स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्, 
भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं, 
तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥

Thursday, 16 January 2020

Bhaktambar Mahima

भक्तामर महिमा


 श्री भक्तामर का पाठ, करो नित प्रातः । भक्ति मन लाई, सब संकट जाये नशाई ॥

 

जो ज्ञान-मान-मतवारे थे, मुनि मानतुंग से हारे थे ।

उन चतुराई से नृपति लिया, बहकाई ॥ सब ॥१॥

मुनि जी को नृपति बुलाया था, सैनिक जा हुक्म सुनाया था ।

मुनि वीतराग को आज्ञा नहीं सुहाई ॥ सब ॥२॥

उपसर्ग घेर तब आया था, बलपूर्वक पकड़ मंगवाया था ।

हथकड़ी बेड़ियों से तन दिया बंधाई ॥ सब ॥३॥

मुनि काराग्रह भिजवाए थे, अड़तालीस ताले लगाये थे ।

क्रोधित नृप बहार पहरा दिया बिठाई ॥ सब ॥४॥

मुनि शान्तभाव अपनाया था, श्री आदिनाथ को ध्याया था ।

हो ध्यान मग्न भक्तामर दिया बनाई ॥ सब ॥५॥ 

सब बंधन टूट गए मुनि के, ताले सब स्वयं खुले उनके ।

काराग्रह से आ बाहर दिए दिखाई ॥ सब ॥६॥

राजा नत होकर आया था, अपराध क्षमा करवाया था ।

मुनि के चरणों में अनुपम भक्ति दिखाई ॥ सब ॥७॥

जो पाठ भक्ति से करता हैं, नित ऋषभ-चरण चित धरता हैं ।

जो ऋद्धि-मंत्र का, विधिवत जाप कराई ॥ सब ॥८॥

भय विघ्न उपद्रव टलते हैं, विपदा के दिवस बदलते हैं ।

सब मन वांछित हो पूर्ण, शान्ति छा जाई ॥ सब ॥९॥

जो वीतराग आराधन हैं, आत्म उन्नति का साधन हैं ।

उससे प्राणी का भव बन्धन कट जाई ॥ सब ॥१०॥

'कौशल' सुभक्ति को पहिचानो, संसार-द्रष्टि बंधन जानो ।

लौ भक्तामर से आत्म-ज्योति प्रगटाई ॥ सब ॥११॥

Shri Parshvanath Stotra

श्री पार्श्वनाथ-स्तोत्र


 नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं, शतेन्द्रं सु पुजै भजै नाय शीशं ।

मुनीन्द्रं गणीन्द्रं नमे जोड़ि हाथं, नमो देव देवं सदा पार्श्वनाथं ॥१॥

गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुडावे, महा आगतै नागतै तू बचावे ।

महावीरतै युद्ध में तू जितावे, महा रोगतै बंधतै तू छुडावे ॥२॥

दुखी दुखहर्ता सुखी सुखकर्ता, सदा सेवको को महा नन्द भर्ता ।

हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विषम डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ॥३॥

दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने ।

महासंकटों से निकारे विधाता, सबे सम्पदा सर्व को देहि दाता ॥४॥

महाचोर को वज्र को भय निवारे, महपौन को पुंजतै तू उबारे ।

महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ शैलेश को वज्र मारा ॥५॥

महामोह अंधेर को ज्ञान भानं, महा कर्म कांतार को धौ प्रधानं ।

किये नाग नागिन अधो लोक स्वामी, हरयो मान दैत्य को हो अकामी ॥६॥

तुही कल्पवृक्षं तुही कामधेनं, तुही दिव्य चिंतामणि नाग एनं ।

पशु नर्क के दुःखतै तू छुडावे, महास्वर्ग में मुक्ति में तू बसावे ॥७॥

करे लोह को हेम पाषण नामी, रटे नाम सो क्यों ना हो मोक्षगामी ।

करै सेव ताकी करै देव सेवा, सुने बैन सोही लहे ज्ञान मेवा ॥८॥

जपै जाप ताको नहीं पाप लागे, धरे ध्यान ताके सबै दोष भागे ।

बिना तोहि जाने धरे भव घनेरे, तुम्हारी कृपातै सरै काज मेरे ॥९॥

दोहा

गणधर इंद्र न कर सके, तुम विनती भगवान । 

द्यानत प्रीति निहार के, कीजे आप सामान ॥

Wednesday, 15 January 2020

NIRVANKAND

 

NIRVANKAND / निर्वाणकांड

(दोहा)

वीतराग वंदूं सदा, भावसहित सिर नाय |
कहूँ कांड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाय ||१||

(चौपाई छन्द)

‘अष्टापद’ आदीश्वर स्वामि, वासुपूज्य ‘चंपापुरि’ नामि |
नेमिनाथ स्वामी ‘गिरनार’, वंदूं भाव भगति उर धार ||२||

चरम तीर्थंकर चरम शरीर, ‘पावापुरि’ स्वामी महावीर |
‘शिखर सम्मेद’ जिनेश्वर बीस, भाव सहित वंदूं निश दीस ||३||

वरदत्तराय रु इंद्र मुनिंद्र, सायरदत्त आदि गुणवृंद |
‘नग सु तारवर’ मुनि उठकोड़ि, वंदूं भाव सहित कर जोड़ि ||४||

श्री ‘गिरनार’ शिखर विख्यात, कोड़ि बहत्तर अरु सौ सात |
शम्भु-प्रद्युम्न कुमर द्वय भाय, अनिरुद्ध आदि नमूँ तसु पाय ||५||

रामचंद्र के सुत द्वय वीर, लाड नरिंद आदि गुणधीर |
पाँच कोड़ि मुनि मुक्ति मँझार, ‘पावागढ़’ वंदूं निरधार ||६||

पांडव तीन द्रविड़ राजान, आठ कोड़ि मुनि मुकति पयान |
श्री ‘शत्रुंजय गिरि’ के सीस, भाव सहित वंदूं निश दीस ||७||

जे बलभद्र मुकति में गये, आठ कोड़ि मुनि औरहु भये |
श्री ‘गजपंथ’ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूँ तिहुँकाल ||८||

राम हनू सुग्रीव सुडील, गवय गवाख्य नील महानील |
कोड़ि निन्याणवे मुक्ति पयान, ‘तुंगीगिरि’ वंदूं धरि ध्यान ||९||

नंग अनंगकुमार सुजान, पाँच कोड़ि अरु अर्ध प्रमान |
मुक्ति गये ‘सोनागिरि’ शीश, ते वंदूं त्रिभुवनपति ईश ||१०||

रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गये ‘रेवा-तट’ सार |
कोटि पंच अरु लाख पचास, ते वंदूं धरि परम हुलास ||११||

रेवानदी ‘सिद्धवर कूट’, पश्चिम दिशा देह जहँ छूट |
द्वय चक्री दश कामकुमार, उठकोड़ि वंदूं भव पार ||१२||

‘बड़वानी’ बड़नयर सुचंग, दक्षिण दिशि ‘गिरि चूल’ उतंग |
इंद्रजीत अरु कुंभ जु कर्ण, ते वंदूं भवसायर तर्ण ||१३||

सुवरणभद्र आदि मुनि चार, ‘पावागिरिवर’ शिखर मँझार |
चेलना नदी-तीर के पास, मुक्ति गये वंदूं नित तास ||१४||

फलहोड़ी बड़गाम अनूप, पश्चिम दिशा ‘द्रोणगिरि’ रूप |
गुरुदत्तादि मुनीश्वर जहाँ, मुक्ति गये वंदूं नित तहाँ ||१५||

बाल महाबाल मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय |
श्री ‘अष्टापद’ मुक्ति मँझार, ते वंदूं नित सुरत संभार ||१६||

अचलापुर की दिश ईसान, तहाँ ‘मेंढ़गिरि’ नाम प्रधान |
साढ़े तीन कोड़ि मुनिराय, तिनके चरण नमूँ चित लाय ||१७||

वंसस्थल वन के ढिंग होय, पच्छिम दिशा ‘कुंथुगिरि’ सोय |
कुलभूषण देशभूषण नाम, तिनके चरणनि करूँ प्रणाम ||१८||

जसरथ राजा के सुत कहे, देश कलिंग पाँच सौ लहे |
‘कोटिशिला’ मुनि कोटि प्रमान, वंदन करूँ जोड़ जुग पान ||१९||

समवसरण श्री पार्श्व जिनंद, ‘रेसिंदीगिरि’ नयनानंद |
वरदत्तादि पंच ऋषिराज, ते वंदूं नित धरम जिहाज ||२०||

‘मथुरापुरी’ पवित्र उद्यान, जम्बूस्वामी जी निर्वाण |
चरम केवली पंचमकाल, ते वंदूं नित दीनदयाल ||२१||

तीन लोक के तीरथ जहाँ, नित प्रति वंदन कीजे तहाँ |
मन वच काय सहित सिरनाय, वंदन करहिं भविक गुणगाय ||२२||

संवत सतरह-सौ इकताल, आश्विन सुदि दशमी सुविशाल |
‘भैया’ वंदन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाणकांड गुणमाल ||२३||

Mahavirashtak Stotra

 

MAHAVIRASHTAK STOTRA / महाविराष्टक स्त्रोत

यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचित:,
समं भान्ति ध्रौव्य-व्यय-जनि-लसन्तोन्तरहिता: |
जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटनपरो भानुरिव यो,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||१||

अताम्रं यच्चक्षु: कमल-युगलं स्पन्द-रहितम्,
जनान्कोपापायं प्रकटयति बाह्यान्तरमपि |
स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||२||

नमन्नाकेन्द्राली-मुकुट-मणि-भा-जाल-जटिलम्,
लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम् |
भवज्ज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||३||

यदर्चा-भावेन प्रमुदित-मना दर्दुर इह,
क्षणादासीत्स्वर्गी गुण-गण-समृद्ध: सुख-निधि: |
लभन्ते सद्भक्ता: शिव-सुख-समाजं किमु तदा,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||४||

कनत्स्वर्णाभासोऽप्यपगत-तनुर्ज्ञान-निवहो,
विचित्रात्माप्येको नृपति-वर-सिद्धार्थ-तनय: |
अजन्मापि श्रीमान् विगत-भव-रागोऽद्भुत-गतिर्,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||५||

यदीया वाग्गङ्गा विविध-नय-कल्लोल-विमला,
वृहज्ज्ञानाभ्भोभिर्जगति जनतां या स्नपयति |
इदानीमप्येषा बुध-जन-मरालै: परिचिता,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||६||

अनिर्वारोद्रेकस्त्रिभुवन-जयी काम-सुभट:,
कुमारावस्थायामपि निज-बलाद्येन विजित: |
स्फुरन्नित्यानन्द-प्रशम-पद-राज्याय स जिन:,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||७||

महामोहातंक-प्रशमन-पराकस्मिकभिषक्,
निरापेक्षो बन्धुर्विदित-महिमा मंगलकर: |
शरण्य: साधूनां भव-भयभृतामुत्तमगुणो,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||८||

महावीराष्टकं स्तोत्रं भक्त्या ‘भागेन्दुना’ कृतम् |
य: पठेच्छ्रुणेच्चापि स याति परमां गतिम् |

Parswanath Chalisa

शीश नवा अरिहंत कोसिद्धन करुं प्रणाम | उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम |

सर्व साधु और सरस्वतीजिन मन्दिर सुखकार | अहिच्छत्र और पार्श्व कोमन मन्दिर में धार ||



|| चौपाई ||
पार्श्वनाथ जगत हितकारीहो स्वामी तुम व्रत के धारी |
सुर नर असुर करें तुम सेवातुम ही सब देवन के देवा ||1


तुमसे करम शत्रु भी हारातुम कीना जग का निस्तारा |
अश्वसैन के राजदुलारेवामा की आँखो के तारे ||2

काशी जी के स्वामी कहायेसारी परजा मौज उड़ाये |
इक दिन सब मित्रों को लेकेसैर करन को वन में पहुँचे ||3

हाथी पर कसकर अम्बारीइक जगंल में गई सवारी |
एक तपस्वी देख वहां परउससे बोले वचन सुनाकर ||4

तपसीतुम क्यों पाप कमातेइस लक्कड़ में जीव जलाते |
तपसी तभी कुदाल उठायाउस लक्कड़ को चीर गिराया ||5

निकले नाग-नागनी कारेमरने के थे निकट बिचारे |
रहम प्रभू के दिल में आयातभी मन्त्र नवकार सुनाया ||6


भर कर वो पाताल सिधायेपद्मावति धरणेन्द्र कहाये |
तपसी मर कर देव कहायानाम कमठ ग्रन्थों में गाया ||7


एक समय श्रीपारस स्वामीराज छोड़ कर वन की ठानी |
तप करते थे ध्यान लगायेइकदिन कमठ वहां पर आये ||8


फौरन ; ही प्रभु को पहिचानाबदला लेना दिल में ठाना |
बहुत अधिक बारिश बरसाईबादल गरजे बिजली गिराई ||9


बहुत अधिक पत्थर बरसायेस्वामी तन को नहीं हिलाये |
पद्मावती धरणेन्द्र भी आएप्रभु की सेवा मे चित लाए ||10


धरणेन्द्र ने फन फैलायाप्रभु के सिर पर छत्र बनाया |
पद्मावति ने फन फैलायाउस पर स्वामी को बैठाया ||11


कर्मनाश प्रभु ज्ञान उपायासमोशरण देवेन्द्र रचाया |
यही जगह अहिच्छत्र कहायेपात्र केशरी जहां पर आये ||12


शिष्य पाँच सौ संग विद्वानाजिनको जाने सकल जहाना |
पार्श्वनाथ का दर्शन पाया सबने जैन धरम अपनाया ||13


अहिच्छत्र श्री सुन्दर नगरीजहाँ सुखी थी परजा सगरी |
राजा श्री वसुपाल कहायेवो इक जिन मन्दिर बनवाये ||14


प्रतिमा पर पालिश करवायाफौरन इक मिस्त्री बुलवाया |
वह मिस्तरी मांस था खाताइससे पालिश था गिर जाता ||15


मुनि ने उसे उपाय बतायापारस दर्शन व्रत दिलवाया |
मिस्त्री ने व्रत पालन कीनाफौरन ही रंग चढ़ा नवीना ||16


गदर सतावन का किस्सा हैइक माली का यों लिक्खा है |
वह माली प्रतिमा को लेकरझट छुप गया कुए के अन्दर ||17


उस पानी का अतिशय भारीदूर होय सारी बीमारी |
जो अहिच्छत्र ह्रदय से ध्वावेसो नर उत्तम पदवी वावे ||18


पुत्र संपदा की बढ़ती होपापों की इक दम घटती हो |
है तहसील आंवला भारीस्टेशन पर मिले सवारी ||19


रामनगर इक ग्राम बराबरजिसको जाने सब नारी नर |
चालीसे को ‘चन्द्र’ बनायेहाथ जोड़कर शीश नवाये ||20

 

सोरठा:

नित चालीसहिं बारपाठ करे चालीस दिन | खेय सुगन्ध अपारअहिच्छत्र में आय के |
होय कुबेर समानजन्म दरिद्री होय जो | जिसके नहिं सन्ताननाम वंश जग में चले ||

Bhajan - Mere Ghar Ke Aage Parshwanath Tera Mandir Ban Jaye

 मेरे घर के आगे पार्श्वनाथ तेरा मंदिर बन जाए -2 जब खिड़की खोलूं तो तेरा दर्शन हो जाए -2 मेरे घर के.......... जया हो जब आरती हो तेरी मुझे ...