Friday, 17 January 2020
Bhaktambar Stotra (Sanskrit)
Thursday, 16 January 2020
Bhaktambar Mahima
भक्तामर महिमा
श्री भक्तामर का पाठ, करो नित प्रातः । भक्ति मन लाई, सब संकट जाये नशाई ॥
जो ज्ञान-मान-मतवारे थे, मुनि मानतुंग से हारे थे ।
उन चतुराई से नृपति लिया, बहकाई ॥ सब ॥१॥
मुनि जी को नृपति बुलाया था, सैनिक जा हुक्म सुनाया था ।
मुनि वीतराग को आज्ञा नहीं सुहाई ॥ सब ॥२॥
उपसर्ग घेर तब आया था, बलपूर्वक पकड़ मंगवाया था ।
हथकड़ी बेड़ियों से तन दिया बंधाई ॥ सब ॥३॥
मुनि काराग्रह भिजवाए थे, अड़तालीस ताले लगाये थे ।
क्रोधित नृप बहार पहरा दिया बिठाई ॥ सब ॥४॥
मुनि शान्तभाव अपनाया था, श्री आदिनाथ को ध्याया था ।
हो ध्यान मग्न भक्तामर दिया बनाई ॥ सब ॥५॥
सब बंधन टूट गए मुनि के, ताले सब स्वयं खुले उनके ।
काराग्रह से आ बाहर दिए दिखाई ॥ सब ॥६॥
राजा नत होकर आया था, अपराध क्षमा करवाया था ।
मुनि के चरणों में अनुपम भक्ति दिखाई ॥ सब ॥७॥
जो पाठ भक्ति से करता हैं, नित ऋषभ-चरण चित धरता हैं ।
जो ऋद्धि-मंत्र का, विधिवत जाप कराई ॥ सब ॥८॥
भय विघ्न उपद्रव टलते हैं, विपदा के दिवस बदलते हैं ।
सब मन वांछित हो पूर्ण, शान्ति छा जाई ॥ सब ॥९॥
जो वीतराग आराधन हैं, आत्म उन्नति का साधन हैं ।
उससे प्राणी का भव बन्धन कट जाई ॥ सब ॥१०॥
'कौशल' सुभक्ति को पहिचानो, संसार-द्रष्टि बंधन जानो ।
लौ भक्तामर से आत्म-ज्योति प्रगटाई ॥ सब ॥११॥
Shri Parshvanath Stotra
श्री पार्श्वनाथ-स्तोत्र
नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं, शतेन्द्रं सु पुजै भजै नाय शीशं ।
मुनीन्द्रं गणीन्द्रं नमे जोड़ि हाथं, नमो देव देवं सदा पार्श्वनाथं ॥१॥
गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुडावे, महा आगतै नागतै तू बचावे ।
महावीरतै युद्ध में तू जितावे, महा रोगतै बंधतै तू छुडावे ॥२॥
दुखी दुखहर्ता सुखी सुखकर्ता, सदा सेवको को महा नन्द भर्ता ।
हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विषम डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ॥३॥
दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने ।
महासंकटों से निकारे विधाता, सबे सम्पदा सर्व को देहि दाता ॥४॥
महाचोर को वज्र को भय निवारे, महपौन को पुंजतै तू उबारे ।
महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ शैलेश को वज्र मारा ॥५॥
महामोह अंधेर को ज्ञान भानं, महा कर्म कांतार को धौ प्रधानं ।
किये नाग नागिन अधो लोक स्वामी, हरयो मान दैत्य को हो अकामी ॥६॥
तुही कल्पवृक्षं तुही कामधेनं, तुही दिव्य चिंतामणि नाग एनं ।
पशु नर्क के दुःखतै तू छुडावे, महास्वर्ग में मुक्ति में तू बसावे ॥७॥
करे लोह को हेम पाषण नामी, रटे नाम सो क्यों ना हो मोक्षगामी ।
करै सेव ताकी करै देव सेवा, सुने बैन सोही लहे ज्ञान मेवा ॥८॥
जपै जाप ताको नहीं पाप लागे, धरे ध्यान ताके सबै दोष भागे ।
बिना तोहि जाने धरे भव घनेरे, तुम्हारी कृपातै सरै काज मेरे ॥९॥
दोहा
गणधर इंद्र न कर सके, तुम विनती भगवान ।
द्यानत प्रीति निहार के, कीजे आप सामान ॥
Wednesday, 15 January 2020
NIRVANKAND
NIRVANKAND / निर्वाणकांड
(दोहा)
वीतराग वंदूं सदा, भावसहित सिर नाय |
कहूँ कांड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाय ||१||
(चौपाई छन्द)
‘अष्टापद’ आदीश्वर स्वामि, वासुपूज्य ‘चंपापुरि’ नामि |
नेमिनाथ स्वामी ‘गिरनार’, वंदूं भाव भगति उर धार ||२||
चरम तीर्थंकर चरम शरीर, ‘पावापुरि’ स्वामी महावीर |
‘शिखर सम्मेद’ जिनेश्वर बीस, भाव सहित वंदूं निश दीस ||३||
वरदत्तराय रु इंद्र मुनिंद्र, सायरदत्त आदि गुणवृंद |
‘नग सु तारवर’ मुनि उठकोड़ि, वंदूं भाव सहित कर जोड़ि ||४||
श्री ‘गिरनार’ शिखर विख्यात, कोड़ि बहत्तर अरु सौ सात |
शम्भु-प्रद्युम्न कुमर द्वय भाय, अनिरुद्ध आदि नमूँ तसु पाय ||५||
रामचंद्र के सुत द्वय वीर, लाड नरिंद आदि गुणधीर |
पाँच कोड़ि मुनि मुक्ति मँझार, ‘पावागढ़’ वंदूं निरधार ||६||
पांडव तीन द्रविड़ राजान, आठ कोड़ि मुनि मुकति पयान |
श्री ‘शत्रुंजय गिरि’ के सीस, भाव सहित वंदूं निश दीस ||७||
जे बलभद्र मुकति में गये, आठ कोड़ि मुनि औरहु भये |
श्री ‘गजपंथ’ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूँ तिहुँकाल ||८||
राम हनू सुग्रीव सुडील, गवय गवाख्य नील महानील |
कोड़ि निन्याणवे मुक्ति पयान, ‘तुंगीगिरि’ वंदूं धरि ध्यान ||९||
नंग अनंगकुमार सुजान, पाँच कोड़ि अरु अर्ध प्रमान |
मुक्ति गये ‘सोनागिरि’ शीश, ते वंदूं त्रिभुवनपति ईश ||१०||
रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गये ‘रेवा-तट’ सार |
कोटि पंच अरु लाख पचास, ते वंदूं धरि परम हुलास ||११||
रेवानदी ‘सिद्धवर कूट’, पश्चिम दिशा देह जहँ छूट |
द्वय चक्री दश कामकुमार, उठकोड़ि वंदूं भव पार ||१२||
‘बड़वानी’ बड़नयर सुचंग, दक्षिण दिशि ‘गिरि चूल’ उतंग |
इंद्रजीत अरु कुंभ जु कर्ण, ते वंदूं भवसायर तर्ण ||१३||
सुवरणभद्र आदि मुनि चार, ‘पावागिरिवर’ शिखर मँझार |
चेलना नदी-तीर के पास, मुक्ति गये वंदूं नित तास ||१४||
फलहोड़ी बड़गाम अनूप, पश्चिम दिशा ‘द्रोणगिरि’ रूप |
गुरुदत्तादि मुनीश्वर जहाँ, मुक्ति गये वंदूं नित तहाँ ||१५||
बाल महाबाल मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय |
श्री ‘अष्टापद’ मुक्ति मँझार, ते वंदूं नित सुरत संभार ||१६||
अचलापुर की दिश ईसान, तहाँ ‘मेंढ़गिरि’ नाम प्रधान |
साढ़े तीन कोड़ि मुनिराय, तिनके चरण नमूँ चित लाय ||१७||
वंसस्थल वन के ढिंग होय, पच्छिम दिशा ‘कुंथुगिरि’ सोय |
कुलभूषण देशभूषण नाम, तिनके चरणनि करूँ प्रणाम ||१८||
जसरथ राजा के सुत कहे, देश कलिंग पाँच सौ लहे |
‘कोटिशिला’ मुनि कोटि प्रमान, वंदन करूँ जोड़ जुग पान ||१९||
समवसरण श्री पार्श्व जिनंद, ‘रेसिंदीगिरि’ नयनानंद |
वरदत्तादि पंच ऋषिराज, ते वंदूं नित धरम जिहाज ||२०||
‘मथुरापुरी’ पवित्र उद्यान, जम्बूस्वामी जी निर्वाण |
चरम केवली पंचमकाल, ते वंदूं नित दीनदयाल ||२१||
तीन लोक के तीरथ जहाँ, नित प्रति वंदन कीजे तहाँ |
मन वच काय सहित सिरनाय, वंदन करहिं भविक गुणगाय ||२२||
संवत सतरह-सौ इकताल, आश्विन सुदि दशमी सुविशाल |
‘भैया’ वंदन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाणकांड गुणमाल ||२३||
Mahavirashtak Stotra
MAHAVIRASHTAK STOTRA / महाविराष्टक स्त्रोत
यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचित:,
समं भान्ति ध्रौव्य-व्यय-जनि-लसन्तोन्तरहिता: |
जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटनपरो भानुरिव यो,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||१||
अताम्रं यच्चक्षु: कमल-युगलं स्पन्द-रहितम्,
जनान्कोपापायं प्रकटयति बाह्यान्तरमपि |
स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||२||
नमन्नाकेन्द्राली-मुकुट-मणि-भा-जाल-जटिलम्,
लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम् |
भवज्ज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||३||
यदर्चा-भावेन प्रमुदित-मना दर्दुर इह,
क्षणादासीत्स्वर्गी गुण-गण-समृद्ध: सुख-निधि: |
लभन्ते सद्भक्ता: शिव-सुख-समाजं किमु तदा,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||४||
कनत्स्वर्णाभासोऽप्यपगत-तनुर्ज्ञान-निवहो,
विचित्रात्माप्येको नृपति-वर-सिद्धार्थ-तनय: |
अजन्मापि श्रीमान् विगत-भव-रागोऽद्भुत-गतिर्,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||५||
यदीया वाग्गङ्गा विविध-नय-कल्लोल-विमला,
वृहज्ज्ञानाभ्भोभिर्जगति जनतां या स्नपयति |
इदानीमप्येषा बुध-जन-मरालै: परिचिता,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||६||
अनिर्वारोद्रेकस्त्रिभुवन-जयी काम-सुभट:,
कुमारावस्थायामपि निज-बलाद्येन विजित: |
स्फुरन्नित्यानन्द-प्रशम-पद-राज्याय स जिन:,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||७||
महामोहातंक-प्रशमन-पराकस्मिकभिषक्,
निरापेक्षो बन्धुर्विदित-महिमा मंगलकर: |
शरण्य: साधूनां भव-भयभृतामुत्तमगुणो,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||८||
महावीराष्टकं स्तोत्रं भक्त्या ‘भागेन्दुना’ कृतम् |
य: पठेच्छ्रुणेच्चापि स याति परमां गतिम् |
Parswanath Chalisa
शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करुं प्रणाम | उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम |
सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार | अहिच्छत्र और पार्श्व को, मन मन्दिर में धार ||
|| चौपाई ||
पार्श्वनाथ जगत हितकारी, हो स्वामी तुम व्रत के धारी |
सुर नर असुर करें तुम सेवा, तुम ही सब देवन के देवा ||1
तुमसे करम शत्रु भी हारा, तुम कीना जग का निस्तारा |
अश्वसैन के राजदुलारे, वामा की आँखो के तारे ||2
काशी जी के स्वामी कहाये, सारी परजा मौज उड़ाये |
इक दिन सब मित्रों को लेके, सैर करन को वन में पहुँचे ||3
हाथी पर कसकर अम्बारी, इक जगंल में गई सवारी |
एक तपस्वी देख वहां पर, उससे बोले वचन सुनाकर ||4
तपसी! तुम क्यों पाप कमाते, इस लक्कड़ में जीव जलाते |
तपसी तभी कुदाल उठाया, उस लक्कड़ को चीर गिराया ||5
निकले नाग-नागनी कारे, मरने के थे निकट बिचारे |
रहम प्रभू के दिल में आया, तभी मन्त्र नवकार सुनाया ||6
भर कर वो पाताल सिधाये, पद्मावति धरणेन्द्र कहाये |
तपसी मर कर देव कहाया, नाम कमठ ग्रन्थों में गाया ||7
एक समय श्रीपारस स्वामी, राज छोड़ कर वन की ठानी |
तप करते थे ध्यान लगाये, इकदिन कमठ वहां पर आये ||8
फौरन ; ही प्रभु को पहिचाना, बदला लेना दिल में ठाना |
बहुत अधिक बारिश बरसाई, बादल गरजे बिजली गिराई ||9
बहुत अधिक पत्थर बरसाये, स्वामी तन को नहीं हिलाये |
पद्मावती धरणेन्द्र भी आए, प्रभु की सेवा मे चित लाए ||10
धरणेन्द्र ने फन फैलाया, प्रभु के सिर पर छत्र बनाया |
पद्मावति ने फन फैलाया, उस पर स्वामी को बैठाया ||11
कर्मनाश प्रभु ज्ञान उपाया, समोशरण देवेन्द्र रचाया |
यही जगह अहिच्छत्र कहाये, पात्र केशरी जहां पर आये ||12
शिष्य पाँच सौ संग विद्वाना, जिनको जाने सकल जहाना |
पार्श्वनाथ का दर्शन पाया सबने जैन धरम अपनाया ||13
अहिच्छत्र श्री सुन्दर नगरी, जहाँ सुखी थी परजा सगरी |
राजा श्री वसुपाल कहाये, वो इक जिन मन्दिर बनवाये ||14
प्रतिमा पर पालिश करवाया, फौरन इक मिस्त्री बुलवाया |
वह मिस्तरी मांस था खाता, इससे पालिश था गिर जाता ||15
मुनि ने उसे उपाय बताया, पारस दर्शन व्रत दिलवाया |
मिस्त्री ने व्रत पालन कीना, फौरन ही रंग चढ़ा नवीना ||16
गदर सतावन का किस्सा है, इक माली का यों लिक्खा है |
वह माली प्रतिमा को लेकर, झट छुप गया कुए के अन्दर ||17
उस पानी का अतिशय भारी, दूर होय सारी बीमारी |
जो अहिच्छत्र ह्रदय से ध्वावे, सो नर उत्तम पदवी वावे ||18
पुत्र संपदा की बढ़ती हो, पापों की इक दम घटती हो |
है तहसील आंवला भारी, स्टेशन पर मिले सवारी ||19
रामनगर इक ग्राम बराबर, जिसको जाने सब नारी नर |
चालीसे को ‘चन्द्र’ बनाये, हाथ जोड़कर शीश नवाये ||20
सोरठा:
नित चालीसहिं बार, पाठ करे चालीस दिन | खेय सुगन्ध अपार, अहिच्छत्र में आय के |
होय कुबेर समान, जन्म दरिद्री होय जो | जिसके नहिं सन्तान, नाम वंश जग में चले ||
Bhajan - Mere Ghar Ke Aage Parshwanath Tera Mandir Ban Jaye
मेरे घर के आगे पार्श्वनाथ तेरा मंदिर बन जाए -2 जब खिड़की खोलूं तो तेरा दर्शन हो जाए -2 मेरे घर के.......... जया हो जब आरती हो तेरी मुझे ...